जिला उपभोक्ता आयोग का बड़ा फैसला ....
- स्टेम सेल संरक्षण में लापरवाही पर कंपनी को 2.16 लाख रुपये चुकाने के आदेश
खबरनामा इंडिया बबलू। कपूरथला, जालंधर
जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग जालंधर ने नवजात बच्चे के गर्भनाल रक्त (Umbilical Cord Blood) और स्टेम सेल संरक्षण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए संबंधित कंपनी को सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार के लिए जिम्मेदार ठहराया है।
आयोग ने कंपनी को शिकायतकर्ताओं को 6,490 रुपये की जमा राशि 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाने के साथ-साथ मानसिक परेशानी और नुकसान के लिए 2 लाख रुपये तथा मुकदमेबाजी खर्च के रूप में 10 हजार रुपये अदा करने के आदेश दिए हैं। इसकी पुष्टि शिकायतकर्ता के एडवोकेट हरअनमोल सिंह ने बताया कि आदेश की कुल अनुपालना 45 दिनों के भीतर करने को कहा गया है।
एडवोकेट हरअनमोल सिंह ने बताया कि मामला जालंधर निवासी हर्सिमरन सिंह सचदेवा और उनकी पत्नी मेहकप्रीत कौर से संबंधित है। दंपति ने गर्भावस्था के दौरान Cordlife Sciences India Private Limited से अपने होने वाले बच्चे के गर्भनाल रक्त और स्टेम सेल को भविष्य में चिकित्सकीय उपयोग के लिए सुरक्षित रखने की सेवा ली थी। इसके लिए उन्होंने प्रारंभिक तौर पर 6,490 रुपये जमा करवाए और कंपनी के साथ आवश्यक समझौता किया था। बच्चे के जन्म के बाद 15 सितंबर 2023 को कंपनी की टीम ने अस्पताल से कॉर्ड ब्लड का नमूना एकत्र किया। कंपनी ने 18 सितंबर को ई-मेल के माध्यम से नमूना सुरक्षित रूप से स्टोरेज सेंटर पहुंचने की पुष्टि भी की थी।
विवाद तब सामने आया जब 25 सितंबर को कंपनी के प्रतिनिधि ने बकाया भुगतान के लिए चेक मांगा। शिकायतकर्ता ने चेक देने पर सहमति जताते हुए कंपनी के कर्मचारी को अपने पते पर दोपहर करीब एक बजे आने के लिए कहा। लेकिन चेक लेने के लिए प्रतिनिधि के पहुंचने से पहले ही कंपनी की ओर से संदेश भेज दिया गया कि भुगतान में देरी के कारण नमूना अस्वीकार कर दिया गया है और अब उसे संरक्षित नहीं किया जा सकता। शिकायतकर्ताओं के अनुसार उन्होंने कभी भुगतान करने से इनकार नहीं किया था और उन्हें इससे पहले कोई स्पष्ट नोटिस, रिमाइंडर या ई-मेल भी नहीं दिया गया था कि भुगतान न होने पर बच्चे का जैविक नमूना स्थायी रूप से नष्ट कर दिया जाएगा।
एडवोकेट हरअनमोल सिंह ने बताया कि कंपनी ने अपने बचाव में समझौते की शर्तों का हवाला देते हुए कहा कि आवश्यक दस्तावेज और भुगतान निर्धारित समय में उपलब्ध नहीं करवाए गए थे। कंपनी ने विशेष रूप से समझौते की धारा 5.5 का उल्लेख किया, जिसके तहत दस्तावेज और फीस समय पर नहीं मिलने पर कंपनी को नमूना प्रोसेस न करने तथा 72 घंटे के बाद उसे नष्ट करने का अधिकार बताया गया था।
हालांकि आयोग ने दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों का अध्ययन करने के बाद पाया कि मामले में भुगतान की समय-सीमा को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी। आयोग के अनुसार समझौते में एक अन्य धारा 8.6 में बकाया भुगतान के लिए 60 कारोबारी दिनों की अवधि का उल्लेख था, जबकि शुल्क संबंधी दस्तावेज में शेष राशि जमा करवाने की कोई स्पष्ट अंतिम तारीख दर्ज नहीं थी। आयोग ने यह भी माना कि शिकायतकर्ता ने भुगतान करने की इच्छा जताई थी और 25 सितंबर को चेक देने के लिए तैयार था।
आयोग ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि कंपनी ने नमूना प्राप्त करने, उसे प्रयोगशाला पहुंचने और सुरक्षित प्राप्ति की पुष्टि करने के बाद अचानक भुगतान में देरी को आधार बनाकर नमूना अस्वीकार कर दिया। आयोग के अनुसार कंपनी ने शिकायतकर्ता को भुगतान के लिए कोई स्पष्ट अंतिम चेतावनी या ऐसा नोटिस नहीं दिया था, जिसमें यह बताया गया हो कि भुगतान न करने पर जैविक नमूना स्थायी रूप से नष्ट कर दिया जाएगा।
फैसले में आयोग ने कहा कि गर्भनाल रक्त का नमूना बच्चे के जन्म के समय ही एकत्र किया जा सकता है और एक बार इसे नष्ट कर दिए जाने के बाद दोबारा प्राप्त करना संभव नहीं है। ऐसे में भुगतान के लिए तैयार उपभोक्ता को उचित अवसर दिए बिना नमूना अस्वीकार करना निष्पक्ष और उचित सेवा के मानकों के अनुरूप नहीं था। आयोग ने इसे सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार माना।
एडवोकेट हरअनमोल सिंह ने बताया कि आयोग दवारा सुनाए गए इस फैसले में आयोग ने शिकायत को आंशिक रूप से मंजूर करते हुए कंपनी को 6,490 रुपये ब्याज सहित लौटाने, 2 लाख रुपये मुआवजा और 10 हजार रुपये मुकदमेबाजी खर्च देने के निर्देश दिए हैं।

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