संत सीचेवाल ने अपनी तनखाह में से किसानों को दिए 100 बोरे खाद....
- मंड इलाके में 50 एकड़ नए समतल किए खेतों में मक्की की बुआई शुरू
- जमीन से लेकर संसद तक किसानों की आवाज बने संत सीचेवाल
खबरनामा इंडिया बबलू। कपूरथला
राज्यसभा सदस्य और पर्यावरण प्रेमी संत बलबीर सिंह सीचेवाल द्वारा मंड इलाके के किसानों की सहायता के लिए अपनी राज्यसभा की तनखाह में से 100 बोरे खाद उपलब्ध करवाए गए हैं। इलाके में पिछले सात महीनों से छोटे किसानों के खेतों को समतल करने की कारसेवा लगातार जारी है। बाढ़ प्रभावित मंड क्षेत्र की जिंदगी अब फिर से पटरी पर लौट रही है।
मंड इलाके में आज लगभग 50 एकड़ नए समतल किए गए खेतों में मक्की की बुआई की शुरुआत भी करवाई गई। इससे पहले गांव बाऊपुर में अकाल पुरख वाहेगुरु के शुक्राने के रूप में श्री सुखमनी साहिब के पाठ के भोग डाले गए। इस अवसर पर इलाके भर से बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।
इस मौके पर संत सीचेवाल ने कहा कि इलाके में कारसेवा के कार्य संगत के सहयोग से निरंतर जारी हैं। उन्होंने बताया कि किसानों के नवंबर महीने तक लगभग 200 से 250 खेत समतल कर गेहूं की बुआई करवाई गई थी। जिन किसानों के खेत उस समय समतल नहीं हो पाए थे, उनके खेत तैयार कर अब मक्की की बुआई शुरू कर दी गई है।
गांव बाऊपुर के सरपंच गुरमीत सिंह ने इलाके के निवासियों की ओर से संत सीचेवाल का धन्यवाद करते हुए कहा कि बाढ़ के दौरान तेज बहते पानी में भी और अब पानी उतर जाने के बाद भी वे लगातार क्षेत्र के साथ डटे रहे। उन्होंने कहा कि बाढ़ ने किसानों की उम्मीदें तोड़ दी थीं, लेकिन संत सीचेवाल की अगुवाई में चल रही कारसेवा ने किसानों में नई आशा जगा दी है।
इसी तरह किसान सतविंदर सिंह बग्गा ने कहा कि संत सीचेवाल जमीन से लेकर संसद तक किसानों की आवाज बुलंद कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में जब इलाके को बड़ी सहायता की आवश्यकता है, तब संत सीचेवाल किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं।
विश्व मातृभाषा दिवस के अवसर पर हर साल की तरह इस बार भी राज्यसभा सदस्य संत बलबीर सिंह सीचेवाल को देश-विदेश से फोन और संदेशों के माध्यम से हार्दिक बधाइयाँ प्राप्त हुईं। संसद में प्रवेश करते ही उन्होंने जो पहला मुद्दा प्रमुखता से उठाया, वह मातृभाषाओं को उनका उचित संवैधानिक और संसदीय सम्मान दिलाने का था।उनकी पहल और प्रभावी पैरवी के चलते तत्कालीन राज्यसभा सभापति एम. वेंकैया नायडू के सहयोग से पंजाबी सहित 22 क्षेत्रीय भाषाओं को संसद के दोनों सदनों में मान्यता प्रदान की गई। यह कदम न केवल पंजाबी भाषा, बल्कि देश की विविध भाषाई विरासत के सम्मान की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।



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