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मुक्ति का द्वार है मुक्तेश्वर धाम; मान्यता- यहां पांडवों ने बिताया था अज्ञातवास

 - ब्यास और चोच नदियों के मिलन बिंदु पर स्थित यह शिवधाम छोटा हरिद्वार कहलाता है

- पठानकोट से 22, मीरथल से 4 और इंदौरा से 7 किलोमीटर दूर है मुक्तेश्चर धाम

- 5500 साल से भी ज्यादा पुराना है मंदिर 

खबरनामा इंडिया (अनिल भट्टी/विनय शर्मा)पठानकोट ,पंजाब 

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पठानकोट के प्रसिद्ध मुक्तेश्वर शिवधाम को प्राचीन पांडव गुफा के नाम से जाना जाता है। शिवालिक की पहाड़ियों में लगभग 5500 साल से भी पुराने इस धाम के बारे में कहा जाता है कि इसे पांडवों ने विकसित किया था। इस धाम को छोटा हरिद्वार भी कहा जाता है। 

मुक्तेश्वर धाम पठानकोट में जिला मुख्यालय से 22 किलोमीटर, मीरथल से 4 किलोमीटर और ब्यास और चोच नदियों के मिलन बिंदु पर इंदौरा से 7 किलोमीटर दूर रावी नदी के किनारे स्थित है। रणजीत सागर बांध और हाल ही में निर्माणधीन शाहपुर कंडी बांध के बीच गांव ढूंग में यह शिवधाम है। किम्वदंति के अनुसार द्वापर युग में युद्धिष्ठिर अज्ञातवास काटने अपने चारों भाइयों और द्रौपदी के साथ लगभग 6 महीने यहां रहे थे। यहां गुफाओं में उन्होंने शिवलिंग स्थापित किया था।

प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर है यह क्षेत्र

सड़क के किनारे पुरातत्व विभाग की तरफ से बोर्ड लगा है। यहीं से रावी नदी के बहने का शोर सुनाई देना शुरू हो जाता है। काफी गहराई में पहाड़ियों के बीच नदी निर्मल धारा भी बहती दिखाई देती है। काफी सीढ़ियां उतरने के बाद मंदिर परिसर में पहुंच जाएंगे, जहां  महाभारत काल की गवाह चार गुफाएं हैं। नीचे दो गुफाओं में से एक बड़ी गुफा में मंदिर, द्रौपदी की रसोई, परिवार मिलन कक्ष आज भी है। बाकी तीन गुफाएं थोड़ा ऊंचाई पर हैं।

                                           

 इनमें से एक में अंगरक्षक सहायक तेली को रात में जगाते रहने के लिए कोहलू लगाया गया था। एक गुफा द्रौपदी के लिए आरक्षित थी और चौथी में दूध और भोजन भंडारण किया जाता था। पठानकोट के आसपास के सबसे पवित्र स्थानों में से एक इस धाम की मुख्य गुफा में गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, हनुमान और देवी पार्वती की मूर्तियां मौजूद हैं। यहां अमावस्या, नवरात्र, बैसाखी और शिवरात्रि पर मेला भी लगता है।



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